अमेरिका, रूस, ईरान और चीन के बीच तेल की खरीदारी का खेल अब भारत के लिए एक बड़ा सबक बनता जा रहा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत महंगा अमेरिकी तेल खरीद रहा है, जबकि चीन रूस और ईरान से रियायती (डिस्काउंटेड) तेल लेकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर रहा है. इस रणनीति से चीन की अर्थव्यवस्था को फायदा हो रहा है और भारत खुद को महंगे विकल्पों में उलझा रहा है.
ईरान से सस्ता तेल छोड़कर महंगे अमेरिकी तेल की खरीदारी
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने X पर लिखा कि ट्रंप प्रशासन भारत पर दबाव डाल रहा है कि रूसी तेल खरीदना बंद करो और इसके बजाय ज्यादा महंगा अमेरिकी क्रूड खरीदो. उन्होंने कहा कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी ऐसा ही दबाव सफल रहा था, जिससे भारत ने ईरान से तेल खरीदना लगभग बंद कर दिया था. उस समय ईरान रियायती तेल देता था, लेकिन अमेरिकी दबाव के कारण भारत ने US को बड़ा सप्लायर बना लिया. अब वही पैटर्न दोहराया जा रहा है.
चेलानी के मुताबिक, भारत ‘इंपोर्ट डाइवर्सिफिकेशन’ के नाम पर अमेरिकी तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की खरीद बढ़ा रहा है. जैसा कि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी माना है. लेकिन अमेरिकी तेल, शिपिंग कॉस्ट मिलाकर, मिडिल ईस्ट के तेल से महंगा पड़ता है. यह फैसला आर्थिक तर्क से ज्यादा राजनीतिक लगता है.
भारत के इस फैसले से क्या नुकसान होंगे?
इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि भारत रूस और ईरान से तेल कम खरीद रहा है, जिससे चीन दुनिया का सबसे सस्ता क्रूड तेल लगभग एक्सक्लूसिव तरीके से खरीद रहा है. रूस और ईरान का तेल ब्रेंट बेंचमार्क से काफी डिस्काउंट पर मिलता है. कभी-कभी Sept. 11 डॉलर प्रति बैरल तक. इससे चीन की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो रही है, जबकि भारत ज्यादा कीमत चुकाकर अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कम कर रहा है.
चेलानी ने लिखा, ‘भारत के ईरानी तेल को बंद करने के फैसले ने चीन को दुनिया के सबसे सस्ते क्रूड का लगभग एक्सक्लूसिव खरीदार बना दिया. नई दिल्ली एक बार फिर चीन की इकोनॉमिक ताकत को अंडरराइट कर रही है.’ उन्होंने कहा कि भारत की चुप्पी इस खेल को और आसान बना रही है.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार
2025-26 में रूसी तेल की हिस्सेदारी घटकर 33-35% रह गई है, जबकि अमेरिकी तेल की हिस्सेदारी बढ़ रही है. रूस से पहले भारत को 1.8-2 मिलियन बैरल प्रतिदिन मिलते थे, अब यह घटकर 1.1-1.2 मिलियन हो गया है. इसी दौरान चीन रूस से रिकॉर्ड मात्रा में तेल खरीद रहा है. फरवरी 2026 में 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से ज्यादा.
ट्रंप ने हाल ही में भारत के साथ ट्रेड डील में रूसी तेल बंद करने का दावा किया था और अमेरिका ने भारत पर लगे 25% पेनल्टी टैरिफ हटा दिया. लेकिन भारत ने कभी आधिकारिक रूप से रूस से तेल बंद करने की बात नहीं मानी. फिर भी, दबाव और सैंक्शंस से रूसी तेल की डिस्काउंट कम हो रही है और भारत को वैकल्पिक स्रोत (जैसे वेनेजुएला) तलाशने पड़ रहे हैं.
क्या भारत को चिंता करने की जरूरत है?
यह स्थिति भारत के लिए चिंता की है, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था दोनों पर असर पड़ रहा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत को अपनी एनर्जी पॉलिसी को राजनीतिक दबाव से अलग रखना चाहिए, वरना चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी फायदा उठाते रहेंगे. अब देखना होगा कि क्या भारत इस दबाव से बाहर निकल पाएगा, या महंगे तेल की कीमत चुकाता रहेगा?

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