‘घर में संस्कार नहीं होंगे, तो होगा मतांतरण’, गोरखपुर में कुटुंब स्नेह मिलन कार्यक्रम में बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत

0
3


Show Quick Read

Key factors generated by AI, verified by newsroom

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि कुटुंब भारत में ही देखने को मिलता है, अन्य देशों में यह सौदा होता है. भारत में अपनेपन से बना संबंध विशेषता है, विदेशों में संबंध ऐसा नहीं हैं, वह सौदे का संबंध हैं. हमारे यहां बच्चे को अपना कुटुंब मिलता है, जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है. वहां बड़े होने पर कुटुंब से मुक्त हो जाते हैं. सामाजिक शिक्षा, आर्थिक गतिविधियों का केंद्र, संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरण का केंद्र कुटुंब ही है. कुटुंब का केंद्र माता है. पीढ़ी को तैयार करने वाली महिला होती है. इसी से भारत माता का परिचय होता है.

उन्होंने कहा कि हम भारत माता के पुत्र है. हमारे देश में महिलाओं को माता की दृष्टि से देखते हैं, सिवाय उसके जिससे शादी हुई है, लेकिन विदेशों में ऐसा नहीं है, वहां महिलाओं को पत्नी की दृष्टि से देखते हैं. बाद में जैसा संबंध बना, बन गया. हमारी दृष्टि केवल वैचारिक नहीं है, यह आचार में आए. यह हमारी परंपरा है, जो परिवार से आती है. हमारे यहां व्यक्ति से बड़ा परिवार है. विदेशों में व्यक्ति परिवार से बड़ा है. हम विवाह को कर्तव्य मानते हैं, करार नहीं. घर में संस्कार नहीं होंगे, तो मतांतरण होगा.

कुटुंब के महत्व के बारे में संघ प्रमुख मोहन भागवत

गोरखपुर जनपद के रामगढ़ताल स्थित बाबा गंभीरनाथ ऑडिटोरियम में सोमवार (16 फरवरी, 2026) को RSS प्रमुख मोहन भागवत ने ‘कुटुंब स्नेह मिलन’ कार्यक्रम में लोगों को कुटुंब के महत्व के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि आज हम अब कुटुंब स्नेह मिलन कार्यक्रम में आए है. एक छत एक चारदीवारी में एक पुरुष महिला से कुटुंब नहीं बनता. कुटुंब में एक रिश्ता होता है, जिसमें अपनापन होता है. शिशु के जन्म के कुछ क्षण बाद अपनेपन से धीरे-धीरे परिवार के सदस्यों से रिश्ता बन जाता है. अगली पीढ़ी सामाजिक बने, इसके लिए कुटुंब एक इकाई है. समाज में कैसे रहना है, इसका प्रशिक्षण परिवार में होता है.

उन्होंने कहा कि समाज कुटुंब के कारण चलता है. पेट भरने का कारण भी कुटुंब ही है. व्यवसाय का आधार परिवार होता है. उत्पादन, पैसे का बचत राष्ट्र की संपत्ति सब परिवार में है. परिवार में राष्ट्र का धन भी संचित है.

कुटुंब का साथ नहीं मिलता, तो संघ खड़ा नहीं होताः संघ प्रमुख

लाल बहादुर शास्त्री जी के माध्यम से इसका उदाहरण देते हुए मोहन भागवत ने लोगों से आवाह्न किया था कि वो अपना सोना-चांदी आदि दे दें, तो राष्ट्र के लिए लोगों ने दे दिया था. उन्होंने कहा कि मैं अकेला नहीं हूं, बल्कि हम सब हैं. अतः केवल अपनी आवश्यकताओं का विचार नहीं करूंगा. यह कुटुंब में सिखाया जाता है. कुटुंब का साथ नहीं मिलता तो संघ खड़ा नहीं होता.

उन्होंने कहा कि कुटुंब का साथ मिलता है, तो कोई भी समाज बड़ा होता है. संघ को जानना है, तो संघ की शाखा देखिए. संघ का स्वयंसेवक देखिए, संघ के स्वयंसेवक का कुटुंब देखिए. हम जो करते हैं, उसे आचरण में लाते हैं. संघ का वर्णन शब्दों में बहुत कठिन है. सौदे के आधार पर संसार चल रहा है, यह सोच जब आई, तबसे समस्याएं आनी शुरू हुई हैं.

छोटे स्तर पर कुटुंब मिलन कार्यक्रम करेः भागवत

सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि समाज को बदलना है, तो कुटुंब में परिवर्तन लाना होगा. हमारा परिवार व्रतस्थ होना चाहिए. रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य शिक्षा और अतिथि-सत्कार, ये कुटुंब की आवश्यक जरूरतें हैं. यह होना चाहिए. छोटे स्तर पर कुटुंब मिलन कार्यक्रम करें, साल में 2-3 बार. छोटे गुटों में मिलना, उसमें विचार-विमर्श करना, जिससे पश्चिमीकरण से आए भ्रम दूर हो जाएंगे. समाज अपना आचरण तब बदलता है, जब गृहस्थ के कार्य को देखता है. संघ के स्वयंसेवक को समाज से अवश्य पांच कदम आगे होना चाहिए. ‘पंच परिवर्तन’ भाषण में नहीं रहना है, उसे स्वयं आचरण में लाना है. सभी विषमताओं से ऊपर उठना होगा. हमारी पहुंच जहां तक है, उसमें जितने प्रकार हैं, उन सबमें हमारा एक मित्र होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि पर्यावरण की चिंता हमें अपने घर से करना है, जो हम कर सकते हैं. अलग से कुछ नहीं करना. पानी बचाओ, प्लास्टिक हटाओ, पेड़ लगाओ. भाषा, भूषा, भवन, भोजन और भजन हमारा अपना होना चाहिए. भाषा भाव को लेकर आती है. घर में अपनी मातृभाषा में बोलना, जिस प्रान्त में रहते हैं, उसकी भाषा को जानना और देश के स्तर पर एक भाषा जो सबके लिए उपयोगी हो सकती है. धोती पहनना हमें आना चाहिए.

दूध पीते बच्चे से लेकर बड़ों तक इसकी चर्चा करनाः संघ प्रमुख

संघ प्रमुख ने कहा कि परंपरागत भोजन हमारे अनुकूल होता है, घर का भोजन, अपना भोजन. घर में चित्र कैसा होना चाहिए, विचार करें. हमारे आदर्शो के चित्र जरूर हमारे घरों में होना चाहिए. जहां तक संभव है, स्वदेशी का प्रयोग करना. नियमों का पालन करना. ये सब बोध हो. इसके लिए सप्ताह में एक दिन सबको साथ बैठना. दूध पीते बच्चे से लेकर बड़ों तक इसकी चर्चा करना. जो सहमति बनती है, उसे व्यवहार लाना. समाज के लिए रोज हम एक अच्छा कार्य करें. क्या कर सकते हैं, उसे सोचना और करना. व्यक्ति के आचरण में और परिवार के आचरण में यह दिखेगा. इसलिए कुटुम्बों का मिलन साल में 2-3 बार होना चाहिए, जिससे समाज में परिवर्तन दिखेगा.


LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here