देश में बैंकों की तरफ से बड़े पैमाने पर लोन राइट ऑफ को लेकर एक बार फिर संसद में सवाल उठे हैं. लोकसभा में सांसद बाबू सिंह कुशवाहा, देवेश शाक्य और नीरज मौर्य ने सरकार से पूछा कि वित्तीय वर्ष 2015 से 2024 के बीच सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के वाणिज्यिक बैंकों की तरफ से लगभग 12.3 लाख करोड़ के कर्ज क्यों राइट ऑफ किए गए और क्या वसूली व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कोई ठोस सुधार प्रस्तावित हैं.
इसके साथ ही सांसदों ने यह भी सवाल किया कि जब बैंकों की लाभ की स्थिति बेहतर हुई है और सकल गैर-कार्यशील परिसंपत्तियों यानी GNPAs में गिरावट आई है, तब भी वित्तीय वर्ष 2025 की पहली छमाही में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तरफ से 42,000 लोन क्यों लिखे गए.
(*10*)राइट ऑफ का मतलब कर्ज माफी नहीं: वित्त राज्यमंत्री
इन सवालों का जवाब देते हुए वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में साफ किया कि लोन राइट ऑफ का मतलब कर्ज माफ करना नहीं होता. उन्होंने बताया कि भारतीय रिज़र्व बैंक के “तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान” संबंधी दिशा-निर्देशों के तहत बैंक राइट ऑफ की प्रक्रिया अपनाते हैं, ताकि अपनी बैलेंस शीट को खराब कर्ज से साफ किया जा सके. मंत्री के अनुसार, ऐसे कर्ज आमतौर पर वे होते हैं, जिन्हें या तो अयोग्य माना जाता है या जिनकी वसूली में बैंक को जरूरत से ज्यादा संसाधन लगाने पड़ते हैं. कई मामलों में ये तकनीकी या प्रूडेंशियल कारणों से लिखे जाते हैं, खासकर तब जब चार साल तक उनके लिए पूरा प्रावधान किया जा चुका होता है.
(*10*)उधार देने वाले की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती
सरकार ने स्पष्ट किया कि लोन राइट ऑफ होने के बावजूद उधार देने वाले की देनदारी समाप्त नहीं होती. कर्ज लेने वाला व्यक्ति या कंपनी अब भी पूरा भुगतान करने के लिए जिम्मेदार रहती है. बैंक ऐसे खातों में वसूली की प्रक्रिया लगातार जारी रखते हैं. मंत्री ने बताया कि राइट ऑफ किए गए कर्जों की वसूली एक सतत प्रक्रिया है और बैंक कानून के तहत उपलब्ध सभी विकल्पों का इस्तेमाल करते हैं. इनमें सिविल कोर्ट और ऋण वसूली न्यायाधिकरण में केस दर्ज करना, SARFAESI कानून के तहत कार्रवाई और दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता यानी IBC के तहत राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण में मामला ले जाना शामिल है.
(*10*)वसूली व्यवस्था को मजबूत करने के लिए क्या कदम उठाए गए
सरकार और RBI ने बीते वर्षों में वसूली तंत्र को अधिक प्रभावी और समयबद्ध बनाने के लिए कई बड़े सुधार किए हैं. मंत्री ने बताया कि IBC लागू होने के बाद कर्जदार और लेनदार के संबंधों में बड़ा बदलाव आया है. अब डिफॉल्ट करने वाली कंपनियों का नियंत्रण प्रमोटरों से हट जाता है और जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों को समाधान प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है. इसके अलावा तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान के लिए एक प्रूडेंशियल फ्रेमवर्क लागू किया गया है, जिससे खराब कर्ज की जल्दी पहचान और समय पर समाधान संभव हो सके. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने इसके लिए विशेष स्ट्रेस्ड एसेट मैनेजमेंट यूनिट और शाखाएं भी बनाई हैं.
(*10*)FY25 की पहली छमाही में कितना लोन राइट ऑफ हुआ
RBI के अस्थायी आंकड़ों का हवाला देते हुए वित्त राज्यमंत्री ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025 की पहली छमाही में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने लगभग ₹35,096 करोड़ का लोन राइट ऑफ किया है. उन्होंने कहा कि NPAs बैंकिंग कारोबार का एक सामान्य लेकिन अवांछनीय हिस्सा हैं, जो कई आर्थिक और प्रशासनिक कारणों से उत्पन्न होते हैं. इन कारणों में कमजोर वैश्विक व्यापार माहौल, कुछ सेक्टर्स में दबाव, कर्ज देने के समय जोखिम का सही आकलन न होना, परियोजनाओं में देरी और लागत बढ़ना शामिल है.
(*10*)GNPA में बड़ी गिरावट, बैंकिंग सिस्टम मजबूत
सरकार ने यह भी बताया कि देश के बैंकिंग सिस्टम की स्थिति पहले से काफी बेहतर हुई है. सकल गैर-कार्यशील परिसंपत्तियां मार्च 2018 में कुल कर्ज का 14.58 प्रतिशत थीं, जो सितंबर 2025 तक घटकर 2.30 प्रतिशत रह गई हैं. यह बैंकिंग सेक्टर के लिए एक बड़ी सुधारात्मक उपलब्धि मानी जा रही है. RBI ने बैंकों के बोर्ड को यह जिम्मेदारी दी है कि वे NPAs और राइट ऑफ को कम करने के लिए प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करें. इसके साथ ही ऋण स्वीकृति से पहले और बाद की जांच, जोखिम प्रबंधन और कर्मचारियों की जवाबदेही पर भी सख्त नियम लागू किए गए हैं.
(*10*)अधिकारियों की जवाबदेही भी तय
वित्त मंत्रालय ने बताया कि बैंकों की बोर्ड-अप्रूवड स्टाफ जवाबदेही नीति के तहत यह सुनिश्चित किया जाता है कि अगर किसी अधिकारी की लापरवाही, गलत निर्णय या तय प्रक्रियाओं का पालन न करने के कारण नुकसान हुआ है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए. सरकार का कहना है कि इन सभी कदमों का मकसद भविष्य में लोन राइट ऑफ को कम करना, वसूली व्यवस्था को मजबूत बनाना और बैंकिंग सिस्टम को अधिक पारदर्शी व जिम्मेदार बनाना है.
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