कश्मीर पर चीन की चाल की भनक लगते ही भारत ने बिछा दी थी कूटनीतिक बिसात

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    कश्मीर पर करीब पांच दशक बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में होने वाली अनौपचारिक बैठक से पूर्व ही भारत को चीन की चाल की भनक लग गई थी। इसके बाद भारत ने चीन को छोड़ यूएनएससी के स्थायी और अस्थायी सदस्यों से उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्क साधा। इनमें ज्यादातर ने बैठक में कश्मीर को द्विपक्षीय मामला बताने का ठोस आश्वासन दिया है। स्थायी देश रूस, फ्रांस और अमेरिका खुलकर भारत के साथ हैं।

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    सूत्रों के मुताबिक, चीन ने विदेश मंत्री एस जयशंकर के दौरे से पहले ही कश्मीर मामले में यूएन में अनौपचारिक बैठक कराने का मन बना लिया था। इसके जवाब में भारत ने यूएन के स्थायी और अस्थायी देशों से संपर्क साधा। रूस ने खुलकर कश्मीर को द्विपक्षीय मामला बताया, वहीं अमेरिका विदेश विभाग ने भी किसी तरह के दखल से इनकार किया है। 

    सूत्रों का कहना है कि ब्रिटेन ने इस संबंध में कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया है लेकिन फ्रांस ने भारत का पक्ष लेने का वादा किया है। इसी तरह 10 अस्थायी देशों में इंडोनेशिया, पेरू, पोलैंड, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका खुलकर भारत के साथ हैं। चीन को छोड़कर अन्य देश फिलहाल इस मामले पर तटस्थ रुख अपनाए हुए हैं।

    चिंतित नहीं है भारत

    अनौपचारिक चर्चा का ज्यादा कूटनीतिक महत्व न होने की वजह से भारत चीन के रुख से चिंतित नहीं है। दरअसल, वर्ष 1971 में हुई अनौपचारिक चर्चा के बाद यूएन ने इस मुद्दे से लगातार दूरी बनाई हुई है। आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान दुनियाभर में बदनाम है, इसलिए कश्मीर पर उसे चीन के अतिरिक्त किसी देश का खुलकर साथ नहीं मिला। इससे पहले बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक मामले में भी पाकिस्तान दुनियाभर में अलग-थलग पड़ गया था। भारत को लगता है कि कश्मीर पर होने वाली यह बैठक वास्तव में अनौपचारिक होकर रह जाएगी।

    यूएन झाड़ सकता है पल्ला

    करीब 48 सालों से कश्मीर विवाद के प्रति उदासीन रुख अपनाने वाला संयुक्त राष्ट्र भविष्य में इस विवाद से पल्ला झाड़ सकता है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह बहुत कुछ बंद कमरे में होने वाली बैठक में स्थायी और अस्थायी देशों के रुख पर निर्भर करेगा। चूंकि चीन के अतिरिक्त इन देशों में से किसी का पाकिस्तान को समर्थन मिलने की उम्मीद नहीं है। ऐसे में भविष्य में यूएन इस विवाद से दूरी बना सकता है।

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