ZEE जानकारी: JNU में जंग, बिहार में हालात तंग

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भारत विरोधाभासों का देश हैं. यहां दो तरह के छात्र हैं..एक वो जिन्हें स्कूल या कॉलेज में अगर एडमिशन मिल जाए तो वो खुद को भाग्यशाली मानते हैं. ये वो छात्र हैं. जो आगे चलकर नौकरी की परीक्षा देने के लिए सैंकड़ों, हज़ारों किलोमीटर का सफर अपनी जान जोखिम में डालकर करते हैं. इसके लिए इन्हें सैंकड़ों किलोमीटर का सफर ट्रेन पर लटकर करना पड़ता है . इन छात्रों को सिर्फ एक डिग्री या नौकरी मिल जाए तो ये खुद को खुशकिस्मत मानते हैं . जिंदगी और रोज़ी-रोटी के संघर्ष में इनके पास..सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करने का समय ही नहीं होता.

दूसरी तरफ वो भाग्यशाली छात्र हैं जो दिल्ली जैसे बड़े शहरों में हज़ारों करोड़ रुपये के कैंपस में रहते हैं . सरकार से हर साल लाखों रुपये की सब्सिडी लेते हैं, जमकर राजनीति करते हैं, और फिल्मी सितारों के साथ तस्वीर खिंचवाते हैं . इन्हें नौकरी की चिंता नहीं होती क्योंकि इन्हें आगे चलकर नेता बनना है, भाषणबाज़ी करनी है और इन्हें टीवी पर आने का भी शौक है . हज़ारों करोड़ रुपये के शानदार Universities कैंपस में बैठकर प्रदर्शन करने वाले इन डिजाइनर छात्रों को आज बिहार के संघर्षशील युवाओं की तस्वीरें देखनी चाहिए

किसी भी छात्र के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण घड़ी होती है परीक्षा की घड़ी. कुछ छात्र परीक्षा में पास होने के लिए जी जान लगा देते हैं. तो कुछ छात्र जान की बाज़ी लगाकर परीक्षा देने पहुंचते हैं. जबकि हमारे ही देश में कुछ छात्र ऐसे भी हैं..जो हर साल…सरकार से 4 लाख 40 हज़ार रुपये तक की सब्सिडी लेने के बाद भी ना तो खुद परीक्षा देना चाहते हैं और ना ही दूसरे छात्रों को परीक्षा देने देते हैं . JNU में इन दिनों ऐसा ही हो रहा है . यहां कुछ मुट्ठी भर छात्रों ने अपना राजनैतिक हित साधने के लिए पूरी यूनिवर्सिटी को बंधक बनाया हुआ है .

आज JNU के ऐसे छात्रों को बिहार से आई कुछ तस्वीरों से सबक लेना चाहिए. कल यानी रविवार को बिहार पुलिस में सिपाही की भर्ती के लिए अलग अलग शहरों में परीक्षाएं हुईं 11 हज़ार 880 पदों के लिए परीक्षा देने वाले युवाओं की संख्या 12 लाख 66 है यानी सिपाही के एक पद के लिए 10 हज़ार 656 युवा दावेदार हैं .

लेकिन इन युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी…परीक्षा केंद्रों यानी Examination Centers तक पहुंचना . इसके लिए राज्य भर में 500 परीक्षा केंद्र बनाए गए थे . और हर परीक्षा केंद्र पर छात्रों की औसत संख्या थी करीब 65 हज़ार . यानी JNU के कुल छात्रों की संख्या से भी करीब 8 गुना ज्यादा. JNU में इस समय करीब 8 हज़ार छात्र पढ़ाई कर रहे हैं .

लेकिन अपने अपने घरों से Examination Centers तक पहुंचना बिहार के इन युवाओं के लिए आसान नहीं था . इसके लिए हज़ारों की संख्या में छात्रों ने इस कड़ाके की ठंड में..ट्रेन के इंजनों पर चढ़कर सफर किया . और परीक्षा केंद्रो से घर लौटते वक्त भी इनका यही हाल था .

इस वक्त आप अपनी टीवी स्क्रीन पर सिपाही परीक्षा में शामिल होने जा रहे युवाओं की तस्वीरें देख सकते हैं . इन छात्रों के सामने इनकी जिंदगी का सबसे महत्वूर्ण परीक्षा था, यानी सबसे महत्वपूर्ण घड़ी थी और ये किसी भी कीमत पर ये मौका गंवाना नहीं चाहते थे . इसलिए कुछ छात्र ट्रेन के इंजनों पर चढ़ गए . कुछ ट्रेन के दरवाज़ों पर लटक गए, कुछ ने खिड़की से अंदर घुसने की कोशिश की तो कुछ भीड़ के आगे बेबस नज़र आए .

इस स्थिति से ये छात्र भी खुश नहीं थे..कुछ युवाओं ने इसका विरोध भी किया..लेकिन हालात JNU जैसे नहीं हुए. ये परिक्षार्थी तमाम मुश्किलों से जूझते हुए परीक्षा केंद्रों तक पहुंचे . क्योंकि इनके सामने रोज़ी रोटी का संघर्ष है..इनके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती किसी तरह से एक नौकरी हासिल करना है..और इस संघर्ष की वजह से इनके पास….विरोध-प्रदर्शनों का समय ही नहीं होता . और ये बात आज देश के उन छात्रों को समझनी चाहिए..जो हज़ारों करोड़ रुपये के आलीशान कैंपसों में पढ़ाई की जगह विरोध-प्रदर्शन करते हैं . जबकि बिहार के इन युवाओं के लिए नौकरी की परीक्षा देना ही जीने मरने का सवाल बन जाता है .

बिहार में इस परीक्षा का अगला चरण 20 जनवरी को आयोजित होगा..यानी ये छात्र एक बार फिर तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए..परीक्षा केंद्रों तक पहुंचेंगे . और इन साढ़े 12 लाख युवाओं में से जिनका सिलेक्शन सिपाही पद के लिए हो जाएगा..उन्हें शुरुआत में करीब 30 हज़ार रुपये प्रति महीने की सैलरी मिलेगी . यानी जितनी सब्सिडी JNU के छात्रों को हर साल मिलती है…उतनी बिहार पुलिस के एक सिपाही की शुरुआती सैलरी भी नहीं होती .

यहां हम ये नहीं कह रहे कि छात्रों को सब्सिडी दिया जाना गलत है . हम ये कह रहे हैं कि भारत में दो तरह के छात्र हैं..एक वो जो पढ़ाई लिखाई छोड़कर…सिर्फ विरोध प्रदर्शनों में व्यस्त हो जाते हैं..और दूसरी तरफ वो युवा हैं…जो एक छोटी सी नौकरी के लिए अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं .

ज़ाहिर है…कुछ छात्र पढ़ाई-लिखाई…नौकरी के लिए नहीं करते..उनका असली मकसद सिर्फ मीडिया में हाईलाइट होना होता है..जिसके ज़रिए वो अपना राजनीतिक करियर तैयार करते हैं… और इसके लिए ये छात्र पढ़ने-लिखने वाले दूसरे छात्रों को भी रोक देते हैं . इनके द्वारा फैलाई गई अव्यवस्था ही इनके लिए सफलता की असली कुंजी बन जाती है. दूसरी तरफ वो युवा हैं…जो असली अव्यवस्था का शिकार तो हैं..लेकिन उनके लिए अपने परिवार का पेट पालने की मजबूरी इतनी बड़ी हो जाती है..कि वो इस अव्यवस्था का विरोध करने की स्थिति में ही नहीं होते .

बिहार पुलिस का इस साल का बजट सिर्फ 9 हज़ार करोड़ रुपये है . जबकि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का निर्माँण जिस ज़मीन पर हुआ है..सिर्फ उस ज़मीन की कीमत ही बाज़ार भाव के हिसाब से करीब 1 लाख करोड़ रुपये है . यानी बिहार पुलिस के कुल बजट से भी 10 गुना ज्यादा . JNU की ज़मीन की कीमत पूरे बिहार के शिक्षा बजट से भी ढाई गुना ज्यादा है . इस साल बिहार का शिक्षा बजट 35 हज़ार करोड़ रुपये था .

ये आंकड़े हम आपको इसलिए दिखा रहे हैं ताकि आपको उस सच्चाई का अंदाज़ा हो जाए. जो विरोध प्रदर्शनों के शोर में अक्सर दब जाती है. JNU में आपको छात्र हर तरह की सुख-सुविधा भोगते हुए दिख जाएंगे . कुछ छात्रों के लिए विरोध प्रदर्शन राजनीति में आने का Launch Pad बन जाता हैं..तो कुछ छात्र बेपरवाही से अपनी सारी चिंताओं को धुएं में उड़ा देते हैं.

लेकिन देश के असली गरीब युवाओं और छात्रों को ये Luxury नहीं मिल पाती..उन्हें अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए मेहनत करनी पड़ती है..कड़ा संघर्ष करना पड़ता है. बिहार में एक सामान्य छात्र की शिक्षा पर सरकार 12 हज़ार रुपये प्रतिवर्ष खर्च करती है . जबकि JNU में एक छात्र पर औसतन करीब 7 लाख रुपये प्रति वर्ष खर्च किए जाते हैं .

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में स्कूल कॉलेज को मिला लें तो औसतन 38 छात्रों को पढ़ाने के लिए एक टीचर उपलब्ध है . ये पूरे देश का सबसे खराब Teacher-Student Ratio है . जबकि JNU में सिर्फ 13 छात्रों पर एक शिक्षक उपलब्ध है . वहीं बिहार की Universities और कॉलेजों में औसतन 67 छात्रों को पढ़ाने के लिए एक शिक्षक उपलब्ध है .

कुल मिलाकर सब्सिडी से लेकर Infrasctructure तक के मामले में अकेला JNU ही पूरे बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर भारी है . लेकिन इसके बदले में JNU के मुट्ठी भर छात्र…देश को सिर्फ हिंसा, विरोध प्रदर्शन और नफरत वाली राजनीति की आग में झोंक रहे हैं . ये सही है कि JNU के 40 प्रतिशत छात्र बहुत गरीब परिवारों से आते हैं . लेकिन ये भी सच है कि JNU के कुछ मुट्ठी भर छात्र अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं के आगे…गरीब छात्रों के भविष्य की बलि दे रहे हैं .

स्थिति ये है कि JNU में आज से पढ़ाई-लिखाई का नया Session शुरू होना था…कुछ नए छात्र जिनका पिछले वर्ष ही Admission हुआ था वो इस उम्मीद के साथ कैंपस पहुंचे कि वो Classes attend कर पाएंगे . लेकिन JNU छात्र संघ और टीचर्स के एक समूह ने ऐलान किया है कि वो इस नए सत्र का विरोध करेंगे . यानी अगर इन लोगों की चली…तो JNU एक बार फिर से विरोध प्रदर्शनों का अड्डा बन जाएगा और उन छात्रों का पढ़ाई-लिखाई करने का सपना एक बार फिर टूट सकता है…जो शिक्षा हासिल करके..अपनी और अपने परिवार की जिंदगी बेहतर बनाना चाहते हैं .

इसलिए हम चाहते हैं कि आज JNU के प्रदर्शनकारी छात्र…उन युवाओं की कहानी देखें…जो मुश्किल परिस्थितियों का सामना करते हुए भी…हिंसा को हथियार नहीं बनाते और परीक्षाएं देकर…खुद को बार बार साबित करते हैं..और अपने साथ साथ..अपने आसपास के समाज को भी शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरित करते हैं.

पूरे देश में 900 से ज्यादा Universities हैं . इनमें लाखों छात्र पढ़ते हैं . लेकिन ले-देकर चार-पांच विश्वविद्यालय ही ऐसे हैं..जहां से बार बार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं . जबकि बाकी के विश्वविद्यालयों में छात्र मन लगाकर पढ़ाई कर रहे हैं .
आजकल युवा शब्द बहुत फैशन में है.. अगर कोई युवा कामयाब हो जाए तो हम जश्न मनाते हैं.. कोई युवा किसी बड़े पद पर पहुंच जाए तो हम फूले नहीं समाते.

हमारे देश को युवा सांसद युवा डॉक्टर..य़ुवा इंजीनियर.. युवा लेखक और तमाम क्षेत्रों में युवा प्रोफेशनल्स चाहिएं.. युवाओं को आगे बढ़ाने की बड़ी बड़ी बातें भी की जाती हैं.. लेकिन भारत के युवाओं की असल स्थिती ये है.. कि कुछ युवा…सारी सुविधाएं होने के बावजूद भी संघर्ष कर रहे हैं…जबकि कुछ युवा एक छोटी सी नौकरी के लिए जान की बाज़ी लगा रहे हैं .

सही व्यव्स्था के अभाव में युवाओं का ये शक्तिपुंज…एक ज्वालामुखी बन जाएगा और राजनीति करने वाले इस ज्वालामुखी का फायदा उठाते रहेंगे . इसलिए हमें युवाओं पर बहुत ध्यान देने की ज़रूरत है.. उनका ख्याल रखने की ज़रूरत है. युवाओं के बारे में हम और आप नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा?

यहां हम JNU के उन छात्रों को भी बधाई देना चाहते हैं..जिन्होंने इन विरोध प्रदर्शनों के बीच भी…IES यानी Indian Economics Service की परीक्षाएं पास की हैं . IES के लिए चुने गए 32 छात्रों में से 18 JNU के हैं..यानी जिन छात्रों में पढ़ने की ललक होती है..उन्हें किसी भी प्रकार की राजनीति रोक नहीं पाती.

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