ZEE जानकारी: आसान भाषा में समझें अमेरिका-ईरान की ‘हेट स्टोरी’ की असली वजह

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आज पूरी दुनिया में तीसरे World War की चर्चा हो रही है. लोग कह रहे हैं कि अमेरिका की एक हरकत की वजह से दुनिया को तीसरा विश्वयुद्ध देखना पड़ सकता है. पिछले कुछ घंटों में दुनियाभर में तेल की कीमतों में 4 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है. दुनिया के ज्यादातर शेयर बाज़ार भी गिर चुके हैं और कई देशों में सोने की कीमतें भी बढ़ गई है. ये सारी बातें सुनकर आपको लग रहा होगा कि कुछ बड़ा होने वाला है.लेकिन क्या आपको इसके पीछे की वजह पता है?  पूरी दुनिया में Third World War की चर्चा इसलिए हो रही है क्योकि अब से कुछ घंटों पहले अमेरिका ने इराक मे एक ड्रोन Attack करके ईरान की सेना के सबसे हाई प्रोफाइल सैन्य अधिकारी मेजरल जनरल कासिम सुलेमानी को मार दिया और जनरल कासिम सुलेमानी की मौत को तीसरे विश्वयुद्ध की आहट माना जा रहा है. ऐसा क्यों हो रहा है. ये जानने से पहले आपको जनरल सुलेमानी की हत्या की पूरी कहानी समझनी होगी. 

अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने इस हमले का आदेश दिया था. ईरान के लिए ये बहुत बड़ा नुकसान है और अब ईरान ने अमेरिका को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है. जनरल कासिम सुलेमानी पूरे पश्चिम एशिया के एक ताकतवर सैन्य अधिकारी ही नहीं माने जाते थे बल्कि उनके प्रशंसकों की संख्या करोड़ों में हैं और अब भारत से लेकर ईरान और इराक तक में उनकी मौत के बाद शोकसभाएं हो रही हैं. ईरान और इराक में हज़ारों की संख्या में लोग अमेरिका के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. अमेरिका और ईरान के संबंध पिछले 40 वर्षों से खराब है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस हमले के बाद दुनिया एक बड़े युद्ध की तरफ बढ़ सकती है और बात बिगड़ने पर कई देश इस युद्ध की ज़द में आ जाएंगे इसलिए आज हम अमेरिका और ईरान की नफरत वाली कहानी का विश्लेषण कर रहे हैं. 

अमेरिका ने ये हमला कैसे और क्यों किया, ये समझने से पहले आपको ये पता होना चाहिए, कि इस हमले के दौरान इराक में आखिर हुआ क्या था? आज इराक की राजधानी बगदाद में एयरपोर्ट के बाहर, अमेरिका के MQ-9 Reaper(रीपर) ड्रोन ने दो गाड़ियों पर चार मिसाइलें दागी. इनमें से एक कार में ईरान के 62 वर्ष के मेजर जनरल कासिम सुलेमानी मौजूद थे और इस हमले में सुलेमानी समेत 5 लोगों की मौत हो गई है. ये हमला इतना भीषण था कि कासिम सुलेमानी की पहचान उनके बाएं हाथ में मौजूद एक अंगूठी की मदद से की गई है. मेजर जनरल सुलेमानी को ईरान का सबसे शक्तिशाली सैन्य कमांडर माना जाता था और कहा जाता था कि वो आगे चलकर ईरान के राष्ट्रपति भी बन सकते थे. इस हमले में ईरान के समर्थन वाले विद्रोही संगठन, कताइब हिज़बुल्लाह के कमांडर अबू महदी की भी मौत हुई है. यानी अमेरिका ने आज सिर्फ एक सैन्य अधिकारी को नहीं बल्कि ईरान के भावी राष्ट्रपति माने जाने वाले सैन्य कमांडर की भी हत्या की है और ईरान इसे हलके में लेने को तैयार नहीं है. 

अब एक नक्शे की मदद से आप समझिए कि ये घटना किस इलाके में हुई है. ईरान के मेजर जनरल पर ये हमला इराक में हुआ है. इराक-ईरान का पड़ोसी देश है. इन दोनों देशों के बीच वर्षों तक दुश्मनी रही है लेकिन पिछले कुछ समय से इराक और ईरान मिलकर आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे है. ईरान और इराक की ये दोस्ती सऊदी अरब से देखी नहीं जाती. ईरान के साथ सऊदी अरब की भी दुश्मनी है क्योंकि दोनों देश खुद को इस्लामिक दुनिया का लीडर बनाना चाहते हैं. पश्चिम एशिया में वरचस्व की इस लड़ाई में इजरायल भी शामिल है. सऊदी अरब और अमेरिका की तरह इज़रायल भी ईरान को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है. इसलिए सऊदी अरब और इजरायल भी अपनी दुश्मनी भुलाकर अब ईरान को घेरने की कोशिश कर रहे हैं. यानी ईरान इस वक्त अकेले दुनिया के तीन शक्तिशाली देशों का दुश्मन नंबर एक बन चुका है और सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान की तरफ से उठाया गय़ा एक कदम..पूरी दुनिया के लिए भारी पड़ जाएगा. 

अमेरिका ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है और इस Secret मिशन को सफल बनाने के लिए अमेरिका, Israel और सऊदी अरब की सेनाओं ने मिलकर लगातार कासिम सुलेमानी की निगरानी की थी. अमेरिका के अखबार The New York Times के मुताबिक जासूसी उपकरणों और Surveillance Aircraft की मदद से मेजर जनरल सुलेमानी की लोकेशन का पता लगाया गया ताकि उन पर अचूक हमला किया जा सके.अमेरिका के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक ये हमला पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी नागरिकों को सुरक्षित रखने के लिए किया गया है लेकिन आज रूस, ईरान, इराक और अमेरिका में भी ट्रंप के इस फैसले का विरोध हो रहा है और ऐसा लगता है Donald Trump ने पश्चिम एशिया में एक नए संघर्ष की शुरुआत कर दी है. यानी ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा अघोषित युद्ध अब एक विश्वयुद्ध की तरफ बढ़ सकता है. 

जनरल सुलेमानी की मौत की खबर आने के फ़ौरन बाद अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने अमेरिका के राष्ट्र ध्वज की तस्वीर Tweet की. इससे आप समझ सकते हैं कि कासिम सुलेमानी को खत्म करना अमेरिका के लिए कितना जरूरी था. ईरान में क़ासिम सुलेमानी की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं. वहां की जनता उन्हें एक नायक मानती थी. इसलिए मौत की खबर मिलने के बाद ईरान में तीन दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया है. ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह ख़मेनी ने सुलेमानी को ‘अमर शहीद’ का दर्जा दिया है और अमेरिका से बदला लेने की धमकी भी दी है. 

मेजर जनरल सुलेमानी ईरान की Special Force Quds(कुद्स) के प्रमुख थे.और वो सीधे ईरान के सुप्रीम लीडर को ही रिपोर्ट करते थे. कहा ये भी जाता है कि कासिम सुलेमानी ही ईरान के असली विदेश मंत्री थे.और ईरान की विदेश नीति की दिशा वही तय करते थे.लेकिन सुलेमानी की इसी ताकत ने उन्हें अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया. 

वर्ष 1998 में कासिम सुलेमानी कुद्स सेना के प्रमुख बने थे और इसके बाद ईरान से लेकर पश्चिम एशिया तक उनकी ताकत लगातार बढ़ती गई. क़ुद्स सेना, ईरान की Islamic Revolutionary Guard Corps की स्पेशल फोर्स है जो विदेशों में Secret Operations को अंजाम देती है. कुद्स सेना पर इराक और सीरिया में अमेरिका के खिलाफ विद्रोहियों को मदद करने का आरोप है.  अमेरिका का दावा है कि वर्ष 2003 के बाद सुलेमानी ने ही इराक के विद्रोहियों को विस्फोटक बनाने की ट्रेनिंग दी थी जिनके हमलों में अमेरिका को बहुत नुकसान हुआ था लेकिन ईरान ने हमेशा ऐसे आरोपों से इनकार किया है. इसलिए पिछले वर्ष अप्रैल में अमेरिका ने कुद्स सेना और Revolutionary Guard को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था. ये पहला मौका था जब अमेरिका ने किसी देश की सेना को आतंकवादी संगठन और उस सेना के चीफ सुलेमानी को आतंकवादी घोषित किया था. सुलेमानी को अमेरिका ने तीन वजहों से निशाना बनाया है. पहली ये कि अमेरिका के मुताबिक इराक के शिया विद्रोहियों को मदद देकर सुलेमानी ने हजारों अमेरिकी सैनिकों की हत्या की साज़िश की थी. दूसरी वजह ये है कि सुलेमानी पर आतंकवादी संगठन हिज़बुल्ला को मदद देने के भी आरोप थे. हिज्बुल्ला को इजारयल का दुश्मन माना जाता है और इजरायल और अमेरिका पक्के दोस्त थे. तीसरी और सबसे बड़ी वजह ये है कि सुलेमानी लगातार ईरान और पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी अधिकारियों पर हमले की तैयारी कर रहे थे. सुलेमानी पर यही तीन आरोप लगाकर अमेरिका ने उनकी हत्या की है. 

अमेरिका ने जिस ड्रोन की मदद से जनरल सुलेमानी की हत्या की है उसका नाम है MQ 9 Reaper. ये एक मानव रहित छोटा विमान होता है और इसे सैंकड़ों किलोमीटर दूर बैठकर रिमोट से कंट्रोल किया जा सकता है. अब आपको जनरल कासिम सुलेमानी के बारे में भी जानना चाहिए. जनरल कासिम सुलेमानी कोई छोटा मोटा नाम नहीं थे बल्कि उन्हें ईरान का सबसे बड़ा सैन्य रणनीतिकार माना जाता था. पिछले दो दशकों में ईरान के सभी बड़े मिलिट्री ऑपरेशन्स उन्हीं के नेतृत्व में अंजाम दिए गए थे. 

जब बात युद्ध और शांति की आती थी तो सुलेमानी का कद ईरान के विदेश मंत्री जैसा हो जाता था.बल्कि कई लोग तो उन्हें ही ईरान का विदेशमंत्री मानते थे. और उनके इसी कद से परेशान अमेरिका उन्हें अपना बड़ा दुश्मन मानने लगा था.सीरिया में जब गृहयुद्ध छिड़ा तो वहां के राष्ट्रपति बशर अल असद को विद्रोहियों से..मेजर जनरल सुलेमानी ने ही बचाया था. लेबनान के आतंकवादी संगठन हिज़बुल्ला के ईरान से संबंध बेहतर करने और ईराक में शिया लड़ाकों को ट्रेनिंग देने का जिम्मा भी सुलेमानी के पास ही था. 

अमेरिका का आरोप है कि सुलेमानी के इशारे पर ही पश्चिम एशिया में हज़ारों अमेरिकियों सैनिकों की हत्या की गई लेकिन ईरान, इराक और सीरिया में मेजर जनरल सुलेमानी को एक सेलिब्रिटी माना जाता था. वो पश्चिमी देशों के लिए एक आतंकवादी थे.लेकिन पश्चिम एशिया में उन्हें एक Cult Figure..यानी ऐसा व्यक्ति माना जाता था जिसके एक इशारे पर लाखों लोग अपनी जान भी दे सकते हैं. ईरान ने सुलेमानी की हत्या को अपने देश की संप्रभुता पर हमला माना है. कासिम सुलेमानी एक शिया मुसलमान थे और पूरी दुनिया के शिया मुसलमान उन्हें एक हीरो मानते हैं.ईरान में सबसे ज्यादा शिया मुसलमान रहते हैं.वहां इनकी संख्या साढ़े 6 करोड़ से ज्यादा है.दुनिया भर के 80 प्रतिशत शिया चार देशों में रहते हैं.ये देश हैं इरान, इराक, पाकिस्तान और भारत. 

इसलिए मेजर जनरल सुलेमानी की हत्या का असर इन देशों पर भी पड़ना तय है.भारत का शिया समुदाय भी सुलेमानी की मौत का शोक मना रहा है. कहा जा रहा है कि कल दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में भी सुलेमानी की मौत के ग़म में एक मजलिस का आयोजन किया जाएगा.इसके अलावा कारगिल और द्रास जैसे इलाकों में सुलेमानी की मौत को लेकर लोग गुस्से और गम में हैं. 

भारत में करीब साढ़े 4 करोड़ शिया रहते हैं और ईरान से भारत के संबंध भी बहुत अच्छे हैं.माना जाता है कि भारतीय इस्लाम पर ईरान का गहरा प्रभाव रहा है.ईरान से आई भाषा. फारसी का इस्तेमाल आज भी भारत में बड़े पैमाने पर होता है. 16वीं 17वीं और 18वीं शताब्दी तक भारत में काम काज की भाषा के तौर पर फारसी का ही इस्तेमाल होता था. रंग, नारंगी, हमेशा, हरगिज़, हरदम, बार-बार, शायद और चूंकि जैसे शब्द फारसी भाषा के ही हैं. यानी भारत और ईरान के संबंध हजारों वर्ष पुराने हैं और अगर भारत सुलेमानी की मौत पर अपना पक्ष साफ नहीं करेगा..तो इसका असर दोनों देशों के संबंधों पर भी पड़ सकता है. 

इस हत्या के बाद इजरायल ने अपनी फौज को अलर्ट कर दिया है. इजरायल ने कासिम सुलेमानी को हमेशा अपना दुश्मन माना है और उसे आशंका है कि ईरान समर्थित आतंकवादी संगठन हिजबुल्ला उनपर हमला कर सकता है। इजरायल का दावा है कि पिछले वर्ष अगस्त में उन्होंने ईरान की कुद्स सेना के एक हमले को विफल किया था। यानी इजरायल ने युद्ध की तैयारी शुरु कर दी है. आज दिनभर सोशल मीडिया पर World War Three Trend करता रहा। इसलिए आप दुनिया के नक्शे पर समझिए कि अगर आज World War three शुरु हो जाए तो कौन देश किसके पक्ष में होगा. 

हमला होने के बाद कई देश ईरान के पक्ष में हैं. इनमें सबसे पहले है रशिया जो ईरान का दोस्त है. इसके बाद चीन भी अमेरिका के खिलाफ ईरान का साथ देगा. इराक इस हमले के बाद से लगातार ईरान के पक्ष में बयान दे रहा है. इसके अलावा यमन, लेबनन, सीरिया और फिलीस्तीन भी ईरान का साथ दे रहे हैं. ईरान पर इस हमले के बाद अमेरिका का साथ दे रहे हैं. इंग्लैंड, फ्रांस, इज़रायल, सऊदी अरब, जॉर्डन और यूएई डोनल्ड ट्रंप के साथ हैं. कई देश ट्रंप के हमले के फैसले से खुश नहीं है लेकिन अगर युद्ध हुआ तो ये अमेरिका का साथ देंगे क्योंकि इनमें से कई देश पश्चिम एशिया में ईरान का वर्चस्व कम होते हुए देखना चाहते हैं. 

आपको बता दें कि 1914 में पहला विश्वयुद्ध हुआ था. यूरोप के देशों में आपसी रंजिश पहले से बढ़ रही थी लेकिन ऑस्ट्रिया के होने वाले राजा और उनकी पत्नी की हत्या कर दी गई थी. इस हत्या के बाद ऑस्ट्रिया ने जर्मनी से मदद मांगी और Bosnia पर हमला कर दिया क्योंकि हत्यारा Bosnia का था. Bosnia का साथ देने के लिए रशिया ने जर्मनी पर आक्रमण कर दिया और इस तरीके से फ्रांस, ब्रिटेन, इटली भी इस युद्ध में कूद पड़े और देखते ही देखते पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ. 

जब-जब प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच ताकत का समीकरण बराबरी पर आने लगता है और जब विश्व की अर्थव्यवस्था सिकुड़ने लगती है, तो विश्वयुद्ध होने की आशंका बढ़ जाती है. आज के समय में अमेरिका और चीन दो ऐसी ताकतें हैं, जो एक दूसरे के करीब-करीब बराबर हैं. वहीं अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था भी कमज़ोर हो रही है. ऐसे में अगर चीन ईरान के पक्ष में आ जाता है और अमेरिका पीछे हटने को राजी नहीं होता है तो रशिया और भारत जैसे देशों को चीन और अमेरिका में से किसी एक को चुनना पड़ेगा.ऐसी स्थिति दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की तरफ धकेल सकती है. 

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