शिवसेना ने कांग्रेस को बताया थकी हुई पार्टी, सामना में लिखा, ‘इसमें युवा कम, बुजुर्ग ज्यादा’

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मुंबई: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 (Maharashtra Assembly Elections 2019) के दौरान कांग्रेस पार्टी को लेकर शिवेसना ने निशाना साधा है. शिवसेना के मुखपत्र सामान मं काग्रेस पार्टी को थकी हुई पार्टी बताया गया हैं. सामना मे लिखा है, ‘खुर्शीद मियां ने तो मतदान के पहले यहां तक कह दिया कि महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए जीतना कठिन है. उन्होंने ये भी भविष्यवाणी कर दी है कि पार्टी का भविष्य अंधेरे में है. इधर सोलापुर में सुशील कुमार शिंदे ने खुर्शीद मियां के इस बयान में हवा भर दी कि ‘कांग्रेस पार्टी अब थक चुकी है.’

शिवसेना ने इस बयान में उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस को भी खींच लिया है. ‘राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी अब थक चुकी है. शरद पवार की उम्र हो गई है. जिस मुद्दे पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का निर्माण हुआ वो मुद्दा भी अब शेष नहीं रहा. इसलिए भविष्य में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस का विलीनीकरण हो जाएगा.’ ऐसे पटाखे सुशील कुमार ने फोड़े हैं. खुर्शीद हों या सुशील कुमार दोनों वरिष्ठ नेता हैं. वे कांग्रेस पार्टी के और उसमें भी गांधी खानदान के निष्ठावान हैं इसलिए उनके बयान का महत्व होता है. इसमें गलत कुछ भी नहीं है. कांग्रेस हो या राष्ट्रवादी कांग्रेस. वर्तमान राजनीति में दोनों ‘थके हुए घोड़े’ ही हैं. उनके घुड़सवारों की जांघों में बल नहीं रहा.

चुनाव की दौड़ में दोनों घोड़ों पर ‘जैकपॉट’ नहीं लग रहा, ये 2016 से बार-बार साबित हो रहा है. इसलिए नाम में कांग्रेसवाले दोनों पार्टियां थक चुकी हैं. कांग्रेस पार्टी तो इतनी थक चुकी है कि राहुल ‘जॉकी’ नहीं बनना चाहते और फिर एक बार सोनिया गांधी पर ‘थकी हुई’ पार्टी की बागडोर संभालने की नौबत आन पड़ी है. बढ़ती उम्र के कारण वे भी थक चुकी हैं. फिर भी उन्होंने पार्टी की लगाम थामी है. लोकसभा चुनाव में राहुल के नेतृत्व से थोड़ी आस जगी थी. उनका साथ देने के लिए प्रियंका गांधी नामक ‘टॉनिक’ भी पार्टी को देने का प्रयास किया गया. हालांकि इसका कोई नतीजा नहीं निकल पाया. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस चित हो गई.

जिन तीन-चार राज्यों में उनकी पार्टी सत्तारूढ़ है उन राज्यों का कार्यभार बुजुर्गों के हाथों में ही है. तो कांग्रेस नामक डेढ़ सौ साल पुरानी पार्टी थकेगी नहीं तो और क्या होगा? पहले कम-से-कम पार्टी में बुजुर्गों और युवाओं का समावेश दिखता था. अब युवा कम और वृद्ध ज्यादा दिखते हैं. इसमें भी बुजुर्ग नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच में फासला होने के कारण पार्टी थकेगी नहीं तो और क्या होगा?

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