महाराष्ट्र में बागियों ने बिगाड़ा भाजपा का गणित, पवार के गढ़ को भी नहीं भेद पाए दिग्गज

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    भाजपा को विधानसभा चुनाव में जोरदार झटका लगा है। शिवसेना को 124 सीटें देकर 164 पर कमल के फूल चुनाव चिन्ह पर लड़ने वाली भाजपा मुश्किल से 100 का आंकड़ा पार कर सकी जबकि भाजपा की तैयारी थी कि वह 140 से 145 सीटों पर आसानी से जीत हासिल कर लेगी। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और कोकण में शिवसेना को सीमित कर बीजेपी ने मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र, विदर्भ में अच्छे प्रदर्शन के लिए जोर लगाया था। पश्चिम महाराष्ट्र में पवार के गढ़ को भेदने की भी पूरी तैयारी की थी लेकिन, 79 साल के शरद पवार का ऐसा जादू चला कि भाजपा की सारी रणनीति धरी की धरी रह गई।

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    भाजपा के 83 बागियों ने लगाया पलीता
    विधानसभा चुनाव में भाजपा ने करीब 17 मौजूदा विधायकों और 4 मंत्रियों का टिकट काट दिया था। वहीं शिवसेना से गठबंधन के चलते उम्मीदवारी न मिलने से भी लोगों में आक्त्रसेश था। भाजपा के करीब ऐसे ही 83 नेता रहे जिन्होंने पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी थी। अपनी ही पार्टी के खिलाफ कई नेताओं ने ताल ठोंक दी थी। नतीजा यह हुआ कि इन बागियों के चलते भाजपा के कई प्रत्याशियों को हार नसीब हुई। मुम्बई से सटे मीरा भाईंदर सीट पर भाजपा की ही पूर्व महापौर गीता जैन भाजपा के प्रत्याशी नरेंद्र मेहता के खिलाफ मैदान में उतरीं और बड़े अंतर से जीत हासिल की। हालांकि अन्य कई बागी उम्मीदवार गीता जैसे भाग्यशाली नही रहे लेकिन, उन्होंने भाजपा की हार जरूर सुनिश्चित कर दी।

    टूट गया 220 सीट का ख्वाब
    इस चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने 288 में से 220 सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए पूरा जोर लगाया था। भाजपा जहां 140 से अधिक सीट पर जीत को लेकर आश्वस्त भी थी वहीं शिवसेना ने भी 100 का आंकड़ा छूने की लिए हरसंभव कोशिश की। किंतु यह सपना पूरा नही हुआ। भाजपा की तरह ही शिवसेना में भी करीब 86 नेताओं ने पार्टी के खिलाफ बगावत कर दिया था जिसका खामियाजा भुगतना पड़ा।

    युवाओं पर भी छाया पवार का जादू
    भाजपा-शिवसेना नेताओं को इसका अंदाजा नहीं था कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार का जादू युवाओं पर चल पाएगा लेकिन, सोशल मीडिया का कमाल रहा कि 79 वर्षीय पवार युवाओं पर भी छा गए थे। बेरोजगारी और पुणे में भारी बरसात से आई बाढ़ ने भी एनसीपी को फायदा पहुंचाया। जिस वक्त पुणे में बाढ़ से लोग परेशान थे उस समय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस महाजनादेश यात्रा में व्यस्त रहे। एनसीपी ने लोगों ने इसका भी फायदा उठाया। इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय (ई डी) की एफआईआर ने शरद पवार के अंदर नया जोश भर दिया। इसके बाद उन्होंने अपने 55 साल के राजनीतिक सफर के अनुभव का इस्तेमाल कर भाजपा के अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत पाने के मंसूबों पर पानी फेर दिया।

    न कोई नीति थी न ही रणनीति, कांग्रेस फिर भी फायदे में
    विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की न तो कोई नीति बनी थी और न ही चुनावी रणनीति थी। फिर भी कांग्रेस फायदे में रही। पिछली बार जितनी सीटें जीती थीं उसे बरकरार रखने में काफी हद तक सफल रही। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने 5 और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सिर्फ तीन सभाएं की थी। अंतिम दौर के चुनाव प्रचार में पूर्व बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने भी शिरकत की। जानकार बताते हैं कि यदि कांग्रेस थोड़ा जोर लगाती और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी या प्रियंका गांधी की सभाएं हुईं होती और योजनाबद्ध तरीके से चुनाव लड़ती तो नतीजे कुछ और होते। संभव था कि कांग्रेस – एनसीपी गठबंधन सवा सौ का आंकड़ा भी छू सकती थी। ऐसी स्थिति में सूबे का राजनीतिक समीकरण बदल सकता था। क्योंकि महाराष्ट्र में एनसीपी की तुलना में कांग्रेस का जनाधार कहीं अधिक है। अब तो विधानसभा में विपक्ष का नेता भी एनसीपी का होगा।
     

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