मंजिलें और भी हैं: वेश्यावृत्ति से मुक्त लड़कियों के चेहरे मुझे ताकत देते हैं

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यह वर्ष 1993 की बात है। मुझे एक प्रेस बैठक में शामिल होने के लिए कमाठीपुरा जाना पड़ा था। यह एशिया का दूसरा सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया है। वहां पर एक फिल्म स्टार पत्रकारों से बातचीत करने वाला था। चूंकि यह इलाका पूरे मुंबई में चर्चित है, सो मुझे भी यह देखने की जिज्ञासा हुई कि आखिरकार इन बदनाम गलियों में क्या है। बैठक खत्म होने के बाद मैं वहां घूमने लगी। वहां लोगों के चेहरों को देखकर मुझे दया आने लगी।

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ऐसा लगा, जैसे मेरा दम घुट रहा हो। सेना में तकरीबन बारह वर्ष बिताने के बाद जब मेरे पति ने रिटायरमेंट लिया, तो हम गुजरात से मुंबई आ गए। मैंने एक गुजराती अखबार के लिए काम करना शुरू किया, जबकि मेरे पति ने एक छोटा व्यवसाय शुरू किया। कमाठीपुरा से घर लौटने पर मैंने अपने पति से सारी बात बताई। उन्होंने कहा कि इस विषय पर वह मुझसे बात करना चाहते थे, क्योंकि उनके एक कर्मचारी को वेश्यालय की एक लड़की से प्यार हो गया था और वह उसे छुड़ाना चाहता था और उससे शादी करना चाहता था। मैं और मेरे पति मानव तस्करी के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे, इसलिए हमने पुलिस से बात करने के बारे में सोचा।

मैंने आयुक्त कार्यालय में बात की। उस लड़की को छुड़ाने के लिए मेरे पति खुद पुलिस के साथ गए। जब वे वहां पहुंचे, तो कई अन्य लड़कियां भी वहां से उन्हें निकालने की गुजारिश करने लगीं। इस तरह करीब तेरह-चौदह लड़कियों को वहां से पुलिस स्टेशन लाया गया। उन सबके बयान दर्ज किए गए। कुछ का अपहरण कर लिया गया था। कुछ अत्यधिक गरीबी में जी रही थीं और अच्छी नौकरी और बेहतर जीवन के वादे के चलते वेश्यावृत्ति की गिरफ्त में आई थीं। पुलिस स्टेशन पर बयान दर्ज करवाने के बाद सभी लड़कियों को हम अपने घर ले आए। उनमें से अधिकांश लड़कियां नेपाल की थीं।

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