आखिर क्यों छह साल के सबसे निचले स्तर है जीडीपी, यह भी हैं कारण

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    – फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स-रोहित झा

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    विकास दर पिछले छह साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई है। अर्थव्यवस्था में पिछले कुछ महीनों से छाई सुस्ती के लिए नोटबंदी और जीएसटी को काफी हद तक जिम्मेदार माना जा रहा है। आम जनता के साथ ही कारोबारी भी यह मानते हैं, कि एक जुलाई 2017 से लागू हुई जीएसटी से व्यापार करना कठिन हो गया है। वहीं जनता का मानना है कि इससे महंगाई पर किसी तरह का ब्रेक नहीं लगा है, बल्कि यह पहले के मुकाबले और ज्यादा बढ़ गई है। नोटबंदी और जीएसटी के अलावा कई अन्य कारण भी हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था की रफ्तार काफी सुस्त हो गई है। औद्योगिक उत्पादन अगस्त में फरवरी 2013 के बाद सबसे निचले स्तर पहुंच गया है। अगस्त में इसकी रफ्तार 1.1 फीसदी के स्तर पर आ गई है। 

    जीएसटी, नोटबंदी से विकास दर में गिरावट

    नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी लागू होने से विकास दर में गिरावट आनी शुरू हुई। इससे पहले विकास दर 8.2 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही थी। फिलहाल यह 2013-14 की विकास दर से भी काफी नीचे चली गई है। उस साल विकास दर 6.4 फीसदी थी। इसके बाद 2014-15 में यह बढ़कर के 7.4 फीसदी हो गई। 2015-16 में विकास दर आठ फीसदी के स्तर पर पहुंच गई। नोटबंदी से पहले वाले वित्त वर्ष यानि 2016-17 में यह 8.2 फीसदी के उच्चतम स्तर पर थी। इसके बाद सरकार ने नोटबंदी की घोषणा की। 

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    नोटबंदी के बाद विकास दर गिरकर 7.2 फीसदी पर आ गई। 2017-18 में जीएसटी के लागू होने के बाद विकास दर बढ़कर के आठ फीसदी पर पहुंच गई। हालांकि जीएसटी को लागू हुए केवल नौ माह हुए थे। वहीं पिछले वित्त वर्ष 2018-19 की पहली तिमाही से लेकर के अर्थव्यवस्था में भयंकर गिरावट देखने को मिली है। पहली तिमाही में यह आठ फीसदी थी, दूसरी तिमाही में सात फीसदी रही, तीसरी तिमाही में यह और घटकर के 6.36 फीसदी पर आ गई। वहीं इस साल की शुरुआती तिमाही और वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में यह घटकर के 5.8 फीसदी रह गई। 

    2013 से शुरू हुई सुस्ती की सुगबुगाहट

    सुस्ती की आहट 2013 से मिलनी शुरू हो गई थी, जब यूपीए-2 के शासनकाल में खुदरा महंगाई दर नौ फीसदी के पार चली गई थी। इस दौरान आरबीआई का रेपो रेट भी आठ फीसदी था। हालांकि 2014-15 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सत्ता संभालने के बाद रेपो रेट 7.5 फीसदी और  महंगाई दर छह फीसदी था। 2015-16 में रेपो रेट 6.5 फीसदी और महंगाई दर 4.9 फीसदी थी। 2016-17 में नवंबर महीने में नोटबंदी के साल में रेपो रेट 6.25 फीसदी थी, जबकि महंगाई दर घटकर के 4.5 फीसदी के स्तर पर आ गई थी। 2017-18 की जुलाई में जीएसटी लागू हुआ था। हालांकि इस वित्त वर्ष में रेपो रेट छह फीसदी और महंगाई दर 3.6 फीसदी पर थी। 2018-19 में महंगाई दर 3.4 फीसदी के स्तर पर आ गई, जबकि रेपो रेट 6.25 के स्तर पर पहुंच गया। 

    नोटबंदी, जीएसटी के अलावा यह भी हैं कारण

    नोटबंदी के बाद मांग में असर देखने को मिला, जिससे लोगों की आमदनी प्रभावित हुई और नौकरियां भी गईं, जिसे अर्थशास्त्री मल्टीप्लाईयर इफेक्ट भी कहते हैं। इसके बाद जीएसटी लागू होने के बाद आयात पर असर पड़ा, क्योंकि आयात करने वालों को रिफंड मिलने में देरी हुई। जैसे-जैसे नोटबंदी और जीएसटी का प्रभाव कम होने लगा, उसी समय आईएलएंडएफएस संकट से एनबीएफसी और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों पर संकट आने लगा। 2018 के अंत में वैश्विक तौर पर अमेरिका-चीन के बीच व्यापार युद्ध और कमजोर कारोबार का असर देश में भी दिखाई देने लगा। 

    जीएसटी की कमियां करेंगे दूर

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि तमाम परेशानियों के बाद भी यह देश का कानून है, जिसका पालन सभी को करना है। वित्त मंत्री ने इसमें खामियां हो सकती हैं, जिनसे लोगों को परेशानी हो रही है, लेकिन अब यह एक कानून है, जिसका पालन हम सभी को करना है। ससंद और राज्यों की विधानसभा में पास होकर अब यह देश का एक कानून बन चुका है। 

    एनबीएफसी कंपनियों पर गहराया संकट

    आईएलएंडएफएस संकट के बाद देश में पूंजी की तरलता में कमी होने लगी। आमतौर पर इसका ज्यादा असर बैंकों के मुकाबले ज्यादा देखने को मिलता है, क्योंकि यह कंपनियां सभी तरह के म्यूचुअल फंड, कॉर्पोरेट सेक्टर, छोटे शहरों व गांवों में मौजूद लोगों को भी कर्ज देती हैं। इस संकट से इन लोगों पर भी असर देखने को मिला, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में, जिसके चलते मांग में गिरावट देखने को मिली। 

    पैसा नहीं होने से हर सेक्टर हुआ प्रभावित

    पिछले डेढ़ साल में ऑटो, रियल एस्टेट, एफएमसीजी, रेडीमेड कपडों, हवाई चप्पल से लेकर के बिस्किट इंडस्ट्री भी कमजोर मांग से प्रभाव दिख रहे हैं। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश में 6300 करोड़ डॉलर के आवासीय प्रोजेक्ट अटके हुए हैं, जो कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं। एनारॉक प्रोपर्टी कंसल्टेंट की एक रिपोर्ट में इस बात की जानकारी दी गई है।  

    सितंबर माह में कंपनी के वाहनों की बिक्री में 57 फीसदी गिरावट देखने को मिली। कंपनी के सितंबर माह में कुल 7,851 वाहन बिके। पिछले साल इसी माह में यह बिक्री 18078 थी। जिन वाहनों की बिक्री में सबसे ज्यादा गिरावट देखने को मिली है उनमें मध्यम से लेकर के भारी वाहन शामिल हैं। 

    इन सेक्टर में गिरा उत्पादन 

    राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, आईआईपी में 77 फीसदी का योगदान करने वाले विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन में 1.2 फीसदी की कमी दर्ज की गई जो पिछले पांच साल का सबसे निचला स्तर है, जबकि अगस्त, 2018 में इसमें 5.2 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। इससे पहले विनिर्माण क्षेत्र का निचला स्तर पर अक्तूबर, 2014 में रहा था जब इसमें 1.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी।

    वहीं बिजली उत्पादन में 0.9 फीसदी की कमी दर्ज की गई, जबकि अगस्त, 2018 में 7.6 फीसदी की बढ़त देखने को मिली थी। खनन क्षेत्र की वृद्धि दर सपाट 0.1 फीसदी ही रही। वहीं पूंजीगत सामान खंड का प्रदर्शन भी सबसे खराब रहा, जिसके उत्पादन में 21 फीसदी की कमी दर्ज की गई जबकि बीते साल इस महीने में यह 10.3 फीसदी रहा था।

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